आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

मेघ, पर्वत, वायुमंडल
पार करती है,
लड़खड़ाती धूप
धरती पर उतरती है।
चीरकर बादल कभी
झरना बनी आती,
पर्वतों की बर्फ पर
बरबस फिसल जाती
वृक्ष छतरी में
कभी कुछ पल उलझ जाती
पहुंच आंगन में
तनिक आराम करती है।
गगनचुंबी भवन में
जब यह पहुंच जाती
ऊपरी मंज़िलों पर
अक्सर अटक जाती,
खुली छत मिल जाए तो
कुछ घडी सुस्ताती,
किस तरह आखिर
सुबह से शाम करती है।
किंतु जब भी गर्मियों का
समय है आता
वनस्पति, नर, पशु इसे
कुछ नहीं भी भाता
शरीरों पर वस्त्र भी
तब बोझ बन जाता,
आग हर दिशि लगाकर
कोहराम करती है।
पहुंच की सीमा नहीं
यह मानती कोई
पर्वतों पर, घाटियों में
मिली यह सोई,
नदी-नालों तक इसे
क्या रोकता कोई
जहाँ भी मन हो वहीं
विश्राम करती है।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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