आज प्रस्तुत हैं मेरी एक ग़ज़ल के कुछ शेर, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-
यहाँ कहीं भी किसी का पता नहीं लगता,
ये रास्ता तो मुझे रास्ता नहीं लगता।
सुना है लोग बहुत से इधर से गुज़रे हैं,
कोई निशान, कोई नक़्श-ए-पा नहीं लगता।
कहाँ की मौज, कहाँ का सफर, कहाँ मंज़िल
कोई बहाव, कोई सिलसिला नहीं लगता।
भले है रात घिरी और अंधेरा है बहुत,
कहीं उजास, कहीं भी दिया नहीं लगता।
दिखे हैं राह में पंछी भी कुछ हमें लेकिन,
पर आसपास कोई घौसला नहीं लगता।
चले कहाँ से, कहाँ हैं, कहाँ पे जाना है,
किसी भी बात का अब तो पता नहीं लगता।
सफर में राह की दुश्वारियां तो हैं लेकिन,
यहाँ किसी से कोई वास्ता नहीं लगता।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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