पीर एक पलती थी!

एक कविता, अंग्रेजी उपन्यास ‘थर्टीन रीज़ंस व्हाई’ पढने के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप-

A woman’s hands in front of her face.

हाँ हमारे बीच ही

एक पीर पलती थी।

सबसे बतियाती,

सब अतिक्रमण सहा करती,

जैसे भी हो, सबसे

घुलमिल कर रहती थी,

सहती थी जो कुछ भी

बुरा लोग करते थे,

बेचारी किससे

क्या कुछ कह सकती थी।

चली गई, छोडकर 

वृतांत दुखी जीवन के,

शर्मिंदा कर उनको

जो बहुत सयाने थे,

पा कभी अकेली,

सताते थे उसको जो

जो वह जीते जी

अक्सर ही सहती थी।

आवारा, दुष्कर्मी

बेलगाम लोगों को

कुछ तो एहसास

तुच्छता का हो जाए,  

जीवन में यदि फिर

संपर्क में कोई आए

वह सब न सहन करे

जो कुछ वह सहती थी।

कुछ तो थे दुष्कर्मी,

भय न जिन्हें कोई था

बहुत से तटस्थ

जिन्हें कोई परवाह न थी

होती परवाह अगर

क्यों सहती बेचारी

वह भी जीवन में

आगे बढ़ सकती थी।

यह था कथानक भर

एक उपन्यास का

लेकिन यह घटता है

हर दिन ही आसपास

कुछ कर दें हम ऐसा,

आगे भयभीत रहें

जो ऐसा करते थे,

जिनकी भी गलती थी।

(अंग्रेजी उपन्यास ‘Thirteen Reasons Why’ पढ़ने के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                            ********

2 responses to “पीर एक पलती थी!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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