कल एक नया गीत शेयर किया था, उसी शीर्षक से अपनी एक और नई रचना आज आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ-

कूदे हम खूब कभी
कविता की रस्सी,
अब तो लगता जैसे
पाँव हुए पत्थर के|
वह छलांग पहले की
कविता में, बाहर भी
मित्रों की महफिल में
औ घर के अंदर भी,
बेफिक्री के वे पल,
कैसे फिर आ सकते
अब तो विश्वास हुए
घायल जीवन भर के।
कविता मन से बाहर
कैसे पल सकती है,
भाव की चिरैया है
मानस में ही बसती है,
छाये हों मन पर जब
बादल आशंका के
यह सहमी रहती, कुछ
हरकत ना करती है।
था वह भी समय कभी
कविता बतियाती थी
हर आते-जाते से
खुलकर, जी भर के।
देखें तो कविता के
रंग बहुत सारे हैं,
नागफनी जैसे
जल के बिन भी पलती है,
सिर्फ बदलना है
कलेवर एहसासों का
नए रूप, सांचों में
कविता ढल सकती है,
कविता तो आएगी
पत्थर में राह बना
सारी बाधा,
सारे दुर्ग पार करके।
जैसी भी हालत हो
हमको तो गाना है
गीत नए जीवन के
नूतन संवत्सर के,
खुशी-खुशी बढ़ना है
मन में संकल्प लिए
नापने क्षितिज सारे
बाहर के, भीतर के,
पिघलेंगे सारे संताप
छिपे मन भीतर
सर्जन की ऊर्जा औ
ताप प्राप्त करके।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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