रात, नींद, सपने!

आज के लिए एक गीत
आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

रात, नींद, सपने
कब होते अपने!

अंधियारी रातों के
सपने भी काले,
रंग भरे हों भी तो
भटकाने वाले,
सच से हैं दूर बहुत
ये सारे सपने।

नींद भी कहाँ अपनी,
उड़ गई कहाँ पगली,
मैं इधर तलाश रहा
पहुंची वो और गली,

नींद के विजन वन का
रास्ता मधुर सपने।

कैसे कैसे सपने
मानव ने देखे हैं,
निद्रा में आएं भले
भाग्य में अलेखे हैं

सुधियों के उपवन को
महका देते सपने।


रात मिले, नींद मिले
और हों मधुर सपने,
पर यथार्थ जीवन में
कब ये होते अपने,

सपनों सा जीवन हो,
जीवन पाएं सपने।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

********

4 responses to “रात, नींद, सपने!”

  1. नमस्कार,,प्यारी रचना

    Liked by 2 people

    1. नमस्कार जी, हार्दिक धन्यवाद।

      Liked by 1 person

Leave a reply to Swamigalkodi Astrology Cancel reply