नदी कभी-2

कल एक गीत लिखा था, आज उसमें ही कुछ और छंद जोडे हैं,

आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत है-

नदी कभी नाला बन जाती है,

नाला कभी नदी बन जाता है।

कुदरत के बलिष्ठ सेनानी हैं

वायु, मेघ, पर्वत, सूरज, तारे

ये ही मंत्री, यही विधायक हैं

दैवी शासन के ये रखवारे,

इनका रुख बदला तो फिर जीवन

पल में क्या से क्या बन जाता है।

सत्ता के मद में बहकर ये सब

अक्सर बेकाबू हो जाते हैं

कभी डुबो देते जल में जीवन

कभी अनंत प्यास दे जाते हैं।

कभी खिलाड़ी बनकर पर्वत भी

बड़े- बड़े पत्थर लुढकाता है।

 

मानव बहुत अबल सम्मुख इनके

जो भी हों उपाय अपनाता है

पर भूचाल, बाढ, सूखा जब हों

जीवन बहुत कठिन हो जाता है।

चेतावनी सुनामी की पाकर

मानव मात्र हिरण बन जाता है।

जो भी हो रहना इनके संग है

सावधान हो सभी उपाय करें,

हरियाली की कमी न होने दें,

अच्छा पर्यावरण सदैव करें,

यह भी कहना है मेरे ईश्वर

कोप आपका दुख दे जाता है।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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2 responses to “नदी कभी-2”

  1. अतिसुन्दर

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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