आज फिर से एक गीत लिखने का प्रयास किया है,
आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत है-

नदी कभी नाला बन जाती है,
नाला कभी नदी बन जाता है।
कुदरत के छल-बल पर निर्भर है
जीव-जंतुओं की हो क्या हालत,
पौधा कभी पनपता बंजर में
फसलें पाले से हो जाती मृत।
अरमानों का अमर दीप भी तो
बुझता हुआ दिया बन जाता है।
हम अभियान चलाते जीवन में
जो दुर्लभ हो उसको पाने के,
लेकिन सहने होते हैं हमको
सदमे सपनों के ढह जाने के,
यह अपनी किस्मत पर निर्भर है
बदले में क्या कुछ मिल पाता है।
पहल हमें करते ही रहना है
प्रतिफल उसके चाहे जैसे हों,
चरण चूमती विजय उन्हीं के है
जो सुख-दुख समत्व से सहते हों,
सदा नहीं हारेंगे निश्चित है
देर-सवेर सुखद फल आता है।
मौसम कितना ही प्रतिकूल रहे
मानव का संकल्प अनूठा है,
जो केवल सुदैव पर निर्भर है
वह तो स्याही पुता अंगूठा है,
धैर्य सहित संकल्प सिद्धि के हित
किया कार्य समिधा बन जाता है।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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