पर्वत से छन कर झरता है पानी!

एक बार फिर से आज मैं, हिंदी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।

इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत–


पर्वत से छन कर झरता है पानी,
जी भर कर पियो
और पियो ।

घाटी-दर-घाटी ऊपर को जाना,
धारण कर लेना शिखरों का बाना,
देता अक्षय जीवन हिमगिरि दानी,
हिमगिरि को जियो
और जियो ।

अतिथि बने बादल के घर में रहना
हिम-वर्षा-आतप हंस-हंस कर सहना
अरुणाचल-धरती परियों की रानी
सुन्दरता पियो
और पियो ।

किन्नर-किन्नरियों के साथ नाचना
स्वर-लय की अनलिखी क़िताब बाँचना,
उर्वशियाँ घर-घर करती अगवानी,
गीतों को जियो
और जियो ।

देना कुछ नहीं और सब कुछ पाना,
ले जाना हो तो घर लेते जाना,
यह सुख है और कहाँ ओ अभिमानी !
इस सुख को पियो
और पियो ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 responses to “पर्वत से छन कर झरता है पानी!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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