दुख !

आज फिर से एक गीत लिखने का प्रयास किया है,
आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत है-


मैं सोचूं दुख जाए तो
कुछ पल मैं
सुस्ता लूं
दुख कहता जाऊंगा,
पहले इसको
निपटा लूं।

रूप बदलकर हर दिन
यह तो आ ही जाता है,
धमकाता, रिसियाता है
हेकड़ी दिखाता है


कैसे शांत करूं
इसको
कौन सा तमंचा लूं।

अपनी पहुंच दिखाकर
मुझको
बहुत चिढ़ाता है
मैं छिपता फिरता हूँ
यह सम्मुख आ जाता है

कैसा धनुष उठाकर मैं
इस पर प्रत्यंचा लूं।


बहुत सताता है ज़ालिम
कैसे हो छुटकारा
बेलगाम फिरता है
सारे घर में आवारा

इसके कृत्यों की गाथा मैं
कहाँ-कहाँ गा लूं।

दुख मांजता मनुज को
ऐसा गुरुजन कहते हैं,
यही सोचकर हम भी
दुख सहते ही रहते हैं

कोई तो सीमा हो,
इसकी
पैमाना क्या लूं।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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3 responses to “दुख !”

  1. सुंदर 👌 नमस्कार 🙏🏻

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    1. धन्यवाद जी, नमस्कार।

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