अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ-

आज फिर बादल घिरे हैं।
हूँ नहीं वह यक्ष जिसकी यक्षिणी करती प्रतीक्षा,
है नहीं संदेश कोई भेजने की तनिक इच्छा,
हर दिशा में दिग्विजय के
अश्व देते हैं दिखाई,
और अपनी ही दशा पर
आ रही फिर-फिर रुलाई,
बालपन के करुण पल
बन स्वप्न आंखों में तिरे हैं।
आज फिर बादल घिरे हैं।
हैं नहीं कुछ स्नेह के बंधन बचे
जो दें दिलासा,
दूर तक वातावरण में
छा रहा गहरा कुहासा,
हे पिता तुम हो कहाँ
है कहाँ बचपन का समय वह,
दर्द मेरा, अश्रु जिन पर
आपके अविरल झरें हैं।
आज फिर बादल घिरे हैं।
है उछलता शिशु कहीं
ज्यों मार्ग में चलते अचानक,
स्वप्न देखे थे कभी यूं
रचेंगे निश्छल कथानक,
पर छली दुनिया
यहाँ पर प्रेम का मौसम कहाँ है,
छल-कपट, विद्वेष फैला
आचरण विष से भरे हैं।
आज फिर बादल घिरे हैं।
प्रेम करने को जगत में
सभी तो आते नहीं हैं,
हर किसी को अन्य जन
खुद की तरह भाते नहीं हैं,
बादलों की तरह करुणा जल
भरे होते नहीं सब
आत्म मुग्ध, सुसभ्य हैं सब
हाँ, नही वे सिरफिरे हैं।
आज फिर बादल घिरे हैं।
क्या करें इस समय से
अपने कदम कैसे मिलाएं
आत्मरति के चलन में
सब भावनाएं भूल जाएं,
बधिक हैं जो आत्मा के
श्रेष्ठतर खुद को समझते
बोलते हैं मृदु वचन,
आशय मगर कुछ दूसरे हैं।
आज फिर बादल घिरे हैं।
अंतहीन, अथाह, शिखर समान
पीड़ा की शिलाएं,
पूज लें इनको, नहीं तो
और बोलो कहाँ जाएं,
क्या करें संकल्प जबकि
विकल्प अब कोई नहीं है।
सरल मानव के लिए
मानक सभी बस भोथरे हैं।
आज फिर बादल घिरे हैं।
श्रीकृष्ण शर्मा अशेष
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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