एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी कवियित्री सुश्री शांति सुमन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया शांति सुमन जी का यह नवगीत–

मौसम की मनमानी – वह तो हद के पार गया ।
सारे अँखुवों को खेतों में पाला मार गया ।
दुबक गई चिड़ियाँ
पत्तों की फटी रजाई में ।
कुहरे की सौगात मिली
इसबार कमाई में ।
जैसे वर्षा आई, सूरज पल्ला झाड़ गया ।
सुबह-शाम दस्तक देती
रहती है सिरहाने ।
सबकुछ ठहर गया है
पछिया बात नहीं माने ।
ऐसी ठंड कि इसके आगे दिन यह हार गया ।
चित्र लिखे से गाछ और घर
साँसे भाप बनीं ।
इतनी सर्द कि आँखों से ही
सबने बात सुनी ।
रात-रात भर का सोचा फिर से बेकार गया ।
हुआ माघ में सावन
रितु की ऐसी आवाजाही
पवन और पानी ने मिलकर
बुनी ऐसी तबाही ।
पड़ा खाट पर किसना लगता सच को ताड़ गया ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to Nageshwar singh Cancel reply