एक बार फिर से आज मैं, हिंदी नवगीत के अद्वितीय हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत–

मौसमी प्यास चौगुनी हुई
देख दुविधा का चाँद अमन्द
फ़सल के कटे खेत में मिला
किसी का टूटा बाजूबंद
ज़ख़्म पर जैसे ठण्डी दवा
लगाने लगी फुरहरी हवा
दर्द ने ली गहरी-सी साँस
हो गईं भारी पलकें बन्द
उठी प्यासे अधरों की पीर
ओजने लगी नयन से नीर
तभी मोती से झरने लगे
कथानक भरे व्यथा के छन्द
और फिर यह टूटी ज़िन्दगी
जहाँ से टूटी जुड़ने लगी
निपट सूनेपन में भर गया
तुम्हारे होने का आनन्द
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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