
आजकल कांवड़ यात्रा चल रही है। हर वर्ष सावन के महीने में कांवड़ यात्रा आयोजित होती है जिसमें श्रद्धालु भक्तजन नंगे पैर अपने कंधों पर कांवड लेकर चलते हैं और उस पर लटके मटकों में पवित्र जल ले जाकर कुछ पवित्र पूजा स्थलों पर, सामान्यतः भोले बाबा की मूर्तियों, शिवलिंग पर चढाते हैं।
यह एक पवित्र यात्रा होती है जिसमें अनेक श्रद्धालुओं के पैरों में छाले पड जाते हैं और लौटने के बाद कुछ दिन उनको ठीक होने में लग जाते हैं। विशेष रूप में उत्तर प्रदेश में इस समय जो सरकार है वह कांवडियों पर विशेष रूप से मेहरबान है, उनके लिए अनेक सुविधाएं प्रदान कर रही है और प्रयास कर रही है कि उनको इस यात्रा में अधिक कष्ट न हो। इसके लिए सरकार ने मार्ग में पडने वाली दुकानों, फलों आदि के ठेलों के लिए भी कठोर नियम बनाए हैं, जो पता नहीं किस हद तक ठीक हैं। यह सब इसलिए किया गया है कि कांवड़ यात्रा करने वाले भक्तजनों को अधिक कष्ट न हो।
ऐसे धार्मिक आयोजनों, प्रयासों में कुछ शरारती तत्व कभी कभी बाधा भी डालते हैं, जैसे कहीं से यह खबर आई थी कि कुछ लोगों ने मार्ग में कांच का चूरा फैला दिया था, जिससे नंगे पैर चलने वाले श्रद्धालुओं के पांव घायल हो जाएं। ऐसे कृत्यों की जितनी निंदा की जाए कम है और ऐसे लोगों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।
लेकिन मैं आज जिस विषय में बात कर रहा था, वह ये हैं कि एक पवित्र धार्मिक यात्रा पर, कठिन संकल्प लेकर निकले श्रद्धालुओं से श्रेष्ठ आचरण की उम्मीद की जाती है, विशेष रूप से तब जबकि सरकार द्वारा उनके लिए अनेक सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। लेकिन यह सच्चाई है कि हर वर्ष कांवड़ यात्रा के दौरान इस भक्ति से भरे अभियान पर निकले लोगों में से कुछ लोगों के द्वारा अत्यंत अशोभनीय व्यवहार किया जाता है, जिसे देखकर लगता है कि हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले और इस पुनीत यात्रा पर निकले लोग क्या इतना अभद्र आचरण कर सकते हैं! समाचार चैनलों पर जो दृश्य देखने को मिले उनसे ऐसा नहीं लगा कि हम भक्त लोगों को देख रहे हैं अपितु वे लोग जो दिखाई दिए वे विशुद्ध गुंडे लग रहे थे। ऐसे लोगों के कारण सच्चे श्रद्धालु भी बदनाम होते हैं। कुछ लोग दुकानों में तोड़-फोड़ करते नज़र आए तो कोई स्कूल बस के कांच तोड़ रहा था।
श्रद्धा का सम्मान अपनी जगह है लेकिन इस प्रकार का आचरण करने वाले गुंडों को अच्छा सबक सिखाया जाना चाहिए जिससे उनके कारण ये पवित्र यात्रा बदनाम न हो।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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