क़त्ल, चोरी, रहज़नी!

क़त्ल, चोरी, रहज़नी व्यभिचार से दिन थे मुखर,
चुप रहा कुछ आज का दिन ख़ास तो अच्छा लगा।

राम दरश मिश्र

4 responses to “क़त्ल, चोरी, रहज़नी!”

  1. वाह्ह्हह्ह्ह्ह 👌

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    1. धन्यवाद जी

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