एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत–

जलता रहता सारी रात एक आस में
मेरे आँगन का आकाशदीप ।
पीले अक्षत का दिन सो गया
और धुँआ हो गया सिवान
मौलसिरी की नन्ही डाल ने
लहरों पर किया दीपदान ।
चुगता रहता अंगार चाँदनी-उजास में
मेरे आँगन का आकाशदीप ।
मौन हुई मन्दिर की घण्टियाँ
ऊँघ रहे पूजा के बोल
मंत्र-बंधी यादों के ताल में
शेफाली शहद रही घोल ।
गढ़ता रहता तमाम रूप आसपास में
मेरे आँगन का आकाशदीप ।
तिथियों के साथ मिटी उम्र की
भीत पर टँकी उजली रेख
हँस-हँस कर नम आँखें बाँचतीं
मटमैले पत्र, शिलालेख ।
वरता रहता सलीब एक-एक साँस में
मेरे आँगन का आकाशदीप ।
रोशनी अँधेरे का महाजाल
बुनती है यह श्यामा रैन
पिंजड़े का सुआ पंख फड़फड़ा
उड़ने को अब है बेचैन ।
कसता रहता सारी रात नागफाँस में
मेरे आँगन का आकाशदीप ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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