आज एक बार फिर से अपनी एक रचना, जो हल्के-फुल्के मूड में गंभीर दिखते हुए लिखी गई शेयर कर रहा हूँ-

ऊपर से पर्ची नहीं आई, ज़िंदा हैं,
लेते हैं हम रोज दवाई, ज़िंदा हैं।
प्यार, मोहब्बत, नफरत, बेकद्री, विद्वेष,
देख लिया है सब कुछ भाई, ज़िंदा हैं।
कई बार ऊपर वाले के थाने में,
हमने अपनी रपट लिखाई, ज़िंदा हैं।
शिथिल हुआ तन, उम्र की इस ऊंचाई पर,
लेकिन हम भीतर से मुक्त परिंदा हैं।
मान रहे अक्सर निर्देश चिकित्सक के,
चख लेते हैं कभी मिठाई ज़िंदा हैं।
बहुत कठिन लगती एकाकी जीवन में,
बिखरे रिश्तों की तुरपाई, ज़िंदा हैं।
सब ज्ञानी हैं यार यहाँ इस बस्ती में,
दिल की क्या कीमत है भाई ज़िंदा हैं।
आज हुआ मन तो कुछ शेर कह दिए हैं,
फिर आगे लिख देंगे भाई, ज़िंदा हैं।
हैं अशेष अब भी अपने अरमान बहुत,
लेकिन समय शेष कम भाई, ज़िंदा हैं।
श्रीकृष्ण शर्मा अशेष
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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