एक बार फिर से आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
भवानी दादा की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता–

शून्य होकर
बैठ जाता है जैसे
उदास बच्चा
उस दिन उतना अकेला
और असहाय बैठा दिखा
शाम का पहला तारा
काफ़ी देर तक
नहीं आये दूसरे तारे
और जब आये तब भी
ऐसा नहीं लगा
पहले ने उन्हें महसूस किया है
या दूसरों ने पहले को!
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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