आज मैं श्रेष्ठ राजस्थानी एवं हिंदी कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
भादानी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश भादानी जी का यह गीत –

धूप सड़क की नहीं सहेली
जब कोरे मेड़ी ही कोरे
छत पसरी पसवाड़े फोरे
छ्जवालों से छींटे मल-मल
पहन सजे शौकीन हवेली
काच खिड़कियों से बतियाये
गोरे आंगन पर इठलाये
आहट सुन कर ही जा भागे
जंगले पर बेहया अकेली
आंख रंग चेहरे उजलाये
हरियल दरी हुई बिछ जाए
छुए न संवलाई माटी की
खाली सी पारात तपेली
सड़क पांव का रोजनामचा
मंडे उमर का सारा खरचा
सुख के नावें जुगों दुखों की
बिगत बांचना लगे पहेली
धूप सड़क की नहीं सहेली
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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