आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवियित्री स्वर्गीया सुमित्रा कुमारी सिन्हा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया सुमित्रा कुमारी सिन्हा जी की यह कविता –

खेल ज्वाला से किया है!
शून्यता जब नयन छाई, हृदय में तृष्णा समाई,
समझ कर पीयूष मैंने
गरल ही अब तक पिया है।
स्वप्न-उपवन में चहक कर, पींजरे में जा, बहक कर-
जग भला क्या जान सकता,
मूल्य मैंने क्या दिया है?
इस अंधेरे देश में पल, पागलों के वेश में चल,
शून्य के ही साथ मैंने
वेदना-विनिमय किया है !
प्यार का पाकर निमन्त्रण, मैं गई,कितना प्रवंचन!
समझ कर वरदान मैंने,
शाप ही अब तक लिया है!
खेल ज्वाला से किया है!
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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