आज मैं अपने एक मित्र और श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय श्याम निर्मम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
निर्मम जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्याम निर्मम जी का यह नवगीत –

रोग बहुत हैं
लेकिन उनका कहीं निदान नहीं ।
ये कैसी अनहोनी
जीवन विष पीते बीता
उमर बढ़ें हर रोज़
मगर ये अश्रु-पात्र रीता
चलते हुए
सभी लगते पर हैं गतिमान नहीं !
आशा की नैया को
मन के सागर ने लूटा
बीच धार का नाविक
थका, किनारे का टूटा
संकल्पों की
फ़सल उगाकर बने महान नहीं !
चेहरा-मोहरा देख
रोटियाँ मुँह तक हैं आतीं,
छोटा-सा है दीप
आंँधियाँ तेज़ बढ़ी जातीं
अगड़े-पिछड़े
हुए बराबर दिखे समान नहीं !
रहे किरायेदार सदा से
हम तन के घर में
ज़ख़्मी पंछी उड़ता है
परवाज़ लिए पर में
पूरा देश
हमारा घर, पर एक मकान नहीं !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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