आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवियित्री स्वर्गीय शांति सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
शांति सुमन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है शांति सुमन जी की यह कविता –

अबके इस होली में कोई रक्तपलाश खिले
अनुबन्धों की याद दिलाए, पीत कनेर हिले
घाट नहाती लड़की जैसे
डूबी हुई हवा
हुई अनमनी छाँहों वाली
गुमसुम लाल जवा
राजमहल कैसे बन जाते कैसे बने किले
पेड़ों की मुण्डेर पर चिड़ियों के हैं पंख सिले
अक्षर-अक्षर छींट गया है
कोई सुबह उदासी
घूँट-घूँट पानी से तर
कर लेता रोटी बासी
चिन्ता तो होती है, पर किससे वह करे गिले
इंच-इंच बिक गया तपेसर होली कहाँ जले
इस मौसम में फिर कोई
जादू ऐसा जनमे
फागुन-फागुन हो जाए दिन
परवत पीर कमे
मजबूरी है वरना कोई कैसे नहीं मिले
रंग-रंग के मेले, मन के नियम नहीं बदले
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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