आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री शिवबहादुर सिंह भदौरिया जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
इनकी कविताएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री शिवबहादुर सिंह भदौरिया जी की यह कविता –

सूख रहे धान और पोखर का जल,
चलो पिया गुहरायें बादल-बादल।
रंग की नुमाइश इन्द्र नहीं लाये,
नदी नहीं बाहें तट तक फैलाये;
सजे कहाँ मेघ-अश्व
बजे कहाँ मादल,
क्षितिजों की आँखों में अँजा कहाँ काजल।
लदे कहाँ नींबू, फालसे, करौंदे,
बये ने बनाये कहाँ घर घरौंदे,
पपिहे ने रचे कहाँ
गीत के महल,
गजल कहाँ कह पाये ताल में कँवल।
पौदों की कजराई धूप ले गई
टूटती उमंगों के रूप दे गई
द्वारे पर मँहगाई
खटकाती साँकल
आई है लेने कंगन या पायल।
इन्द्र को मनायेंगे टुटकों के बल
रात ढले निर्वसना जोतेंगी हल
दे जाना, तन-मन से
होकर निर्मल
कोंछ भर चबेना औ लोटे भर जल।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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