तार भी छेड़ा टूट गया!

सोचा था हरीम-ए-जानाँ में नग़्मा कोई हम भी छेड़ सकें,
उम्मीद ने साज़-ए-दिल का मगर जो तार भी छेड़ा टूट गया।

शमीम जयपुरी

3 responses to “तार भी छेड़ा टूट गया!”

  1. बहुत खूब

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    1. धन्यवाद जी

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