आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय रामस्वरूप सिंदूर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ।
इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राम्स्वरूप सिंदूर जी का यह गीत –

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय रामस्वरूप सिंदूर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ।
इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामस्वरूप सिंदूर जी का यह गीत –
बाहर के मधुबन से टूटा नाता,
पर क्या हो भीतर के नन्दन-वन का!
तैरते रंग अन्तर-धाराओं में
गुह्यतम गुफाएँ सौरभ गाती हैं,
जन्मान्ध घाटियाँ झील-झील होतीं
संवेगों में तितलियाँ नहाती हैं,
बाहर के सावन से टूटा नाता,
पर क्या हो भीतर के नन्दन-वन का!
आँखों की ओट छिपी सौ-सौ आँखें
घूमते स्वप्न मीना-बाज़ारों में,
अधरों की ओट खुली मधुशालाएँ
अन्तरर्ध्वनियाँ झूमती बहारों में,
बाहर के गुंजन से टूटा नाता,
पर क्या हो भीतर के कल-कूजन का!
मैं प्रथम छन्द संसृति के उस क्षण का
जिसने फूलों को गन्ध कहा होगा,
मैं काल-पात्र उस आदिम यौवन का
जो विम्बों में आसक्त रहा होगा,
बाहर के दर्पण से टूटा नाता,
पर क्या हो भीतर के सम्मोहन का!
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to Nageshwar singh Cancel reply