आदमी धुएं के हैं!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की है।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह जी की यह कविता –

ताँबे का आसमान,
टिन के सितारे,
गैसीला अन्धकार,
उड़ते हैं कसकुट के पंछी बेचारे,
लोहे की धरती पर
चाँदी की धारा
पीतल का सूरज है,
राँगे का भोला-सा चाँद बड़ा प्यारा,
सोने के सपनों की नौका है,
गन्धक का झोंका है,
आदमी धुएँ के हैं,
छाया ने रोका है,
हीरे की चाहत ने
कभी-कभी टोका है,
शीशे ने समझा
कि रेडियम का मौका है,
धूल ‘अनकल्चर्ड’ है,
इसीलिए बकती है-
– ‘ज़िन्दगी नहीं है यह- धोखा है, धोखा है !’


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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