आज मैं विख्यात कवि स्वर्गीय भारत यायावर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
यायावर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। वे फेसबुक पर मेरे मित्र थे।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत यायावर जी की यह कविता –

कवि धूमिल को समर्पित
एक आदमी देखता है, खोजता है,
रचनात्मक संघर्ष करता है
अपने भावों, विचारों, अनुभवों को
कल्पना की मथानी से मथकर
भाषा का सन्धान करता है
डूबता है अपने ही भीतर
और एक रचना बनाता है
एक दूसरा आदमी है
जो साहित्य मर्मज्ञ है
वह उस रचना का आस्वाद लेता है
फिर उसको अपने दिल से लगाता है
पूछो उससे तो कहेगा
वाह, भई, वाह !
ऐसी रचना है
कि बहुत-कुछ कहती है
पर कितना चुप रहती है !
गले तक लिपटती है
फिर मन में बसती है
हाय-हाय कितना बेचैन करती है
आह्लाद भरती है
बार-बार पढ़ने की प्रेरणा जगाती है
एक तीसरा आदमी है
जो न रचना करता है
जो न रचना समझता है
न वह लगाव रखता है
बस, रचना से खेलता है
सिर्फ फ़तवेबाज़ी करता है
पूरे रचना परिदृष्य पर ऐसा पसरता है
कि रचना की सांस फूलती है
वही तीसरा आदमी सभाओं में चमकता है
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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