आज मैं विख्यात गीतकार स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ।
रंग जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत–

हम अधिकारी नहीं समय की अनुकम्पाओं के!
पुराना सब कुछ बुरा न रहा,
नया भी सब कुछ नहीं महान;
प्रगति के संग सँवरते रहे,
चिरंतन जीवन के प्रतिमान।
हम प्रतिहारी नहीं टूटती परम्पराओं के!
हम अधिकारी नहीं समय की अनुकम्पाओं के!
बधिरता को क्या सौंपा जाय?
शांति का ओजस्वी आह्वान,
क्रांति क्या कर ले अंगीकार;
आधुनिक सामंती परिधान?
हम सहकारी नहीं, अनर्गल आशंकाओं के!
हम अधिकारी नहीं समय की अनुकम्पाओं के!
तिमिर की शर-शय्या पर पड़ा,
दे रहा है प्रवचन दिनमान;
निरंतर उद्घाटित हो रहा,
चाँद तारों का अनुसंधान;
हम आभारी नहीं कलाविद् अभियन्ताओं के!
हम अधिकारी नहीं समय की अनुकम्पाओं के!
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to samaysakshi Cancel reply