आज मैं हिंदी की श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
माचवे जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की यह कविता–

बादल बरसै मूसलधार
चरवाहा आमों के नीचे खड़ा किसी को रहा पुकार
एक रस जीवन पावस अपरम्पार
मेघों का उस क्षितिजकूल तक पता न पाऊँ
कि कैसा घुलमिल है संसार
— एक धुन्ध है प्यार …
बहना है
यह सुख कहना क्या
उठना-गिरना लहर-दोल पर
हिय की घुण्डी मुक्त खोल कर
पर उस दूर किसी नीलम-घाटी से यह क्या बारम्बार …
चमक-चनक उठता है ?
बिम्बित आँखों में अभिसार …
आज दूर के सम्मोहन ने यात्रामय कर डाला
बिखर गया वह संचित सुधि-धन जो युग-युग से पाला ।
पर यह निराकार आदहार
कहाँ से सीटी बजा रहा है
पुला रहा है, पर बेकार —
यहाँ से छुट्टी रज़ा कहाँ है ?
गैयाँ चरती हैं उस पार
दूर धबीले चिह्न-मात्र हैं
जमना लहरे तज बन्ध —
बादल बरसै मूसलधार
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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