आज मैं हिंदी के विख्यात कवि श्री प्रयाग शुक्ल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री प्रयाग शुक्ल जी की यह कविता–

मेरी भी एक जेब है ।
पत्नी कहती है
रहती है खाली ।
खाली जेब हर सुबह मिलती है खाली ।
कोट की जेब हो या कमीज़ की ।
पेड़ को चिंता नहीं है ठूँठ की
चिड़ियाँ चहचहाती हैं
मैं जब एक पगडंडी पर चला जा रहा होता हूँ
घास पर– पीली मुरझाई घास पर
धीरे-धीरे माथे को तपा कर धूप
दिलाती है याद हज़ार चीज़ों की ।
मैं हाथ डालता हूँ जेब में
खाली जेब । खाली । कोई बात नहीं
मैं उसे धूप पर उलट दूँ
या बंद रखूँ
कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।
खाली । जेब । खाली जेब की स्मृतियाँ ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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