आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री नंद किशोर आचार्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
आचार्य जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नंद किशोर आचार्य जी की यह कविता –

साँपिन अंडे देती है
और कुँडली में घेर लेती उन्हें
और खाती रहती है
अपने ही बच्चों को !
– कहते है प्रकृति से विवश है वह।
ओ कालव्याली !
हम भी तो बँधे हैं जन्म ही से
तुम्हारी कुँडली में
और अचानक ग्रस लिया जाता है हम को
– तुम भी विवश हो क्या ?
तो लो माँ
ग्रस लो मुझे जब चाहो
तनिक भी इच्छुक नहीं हूँ मैं
तुम्हारी कुँडली से निकल पाने के लिए
– यदि सम्भव हो भी तो
क्योंकि मैं अपनी ही सन्तति को
खाना नही चाहता।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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