आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय नंद चतुर्वेदी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
नंद चतुर्वेदी जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नंद चतुर्वेदी जी की यह कविता –

उस तरह मैं नहीं पढ़ सका
जिस तरह चाहिए
इस किताब में लिखी इबारत
यह किताब जैसी भी बनी हो
जिस किसी भी भाषा में लिखी गयी हो
लेकिन जब कभी पढ़ी जाएगी
बहुत कुछ विलुप्त हो जाएगा
मैं ही कभी
गा-गा कर पढ़ने लगूँगा
कभी अटक-अटक कर
मैं ही बदल दूगाँ
उद्दण्डतापूर्वक कभी कुछ
हँसने लगूँगा
इस तरह के शब्दों के
हिज्जे लिखी देखकर
बहरहाल उस तरह नहीं पढूँगा
जिस तरह चाहिए
बदल-बदल कर पढ़ने से
किताब का कुछ भी नष्ट नहीं होगा
बच जाएगा जितना बच सकता है।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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