आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ पत्रकार और कवि स्वर्गीय तारादत्त निर्विरोध जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ।
तारादत्त निर्विरोध जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय तारादत्त निर्विरोध जी की यह ग़ज़ल –

आदमी खजूर हो गए
दूर और दूर हो गए
कल मिले इनाम जो हमें
आज वो कुसूर हो गए
दर्द हैं कबीर जायसी
गीत-राग सूर हो गए
मुक्ति तो हमें मिली मगर
हम ऋणी ज़रूर हो गए
पाँव देख रो पड़े हमीं
जिस घड़ी मयूर हो गए
छल कपट उदार हैं सभी
क्योंकि सत्य क्रूर हो गए
पारसा नहीं रहे वहाँ
महफ़िलों के नूर हो गए
निर्विरोध हम कहाँ रहे
लक्ष्य जब हुज़ूर हो गए
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to R. Marshall Cancel reply