अब मत सोचो!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।

ठाकुर प्रसाद सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का यह नवगीत –



अब मत सोचो प्रिय रे, अब मत सोचो
आँखों के जल को प्रिय वंशी से पोंछो

धानों के खेतों-सी गीली
मन में यह जो राह गई है
उस पर से लौट गए प्रियतम के
पैरों की छाप नई है

पाँवों के चिन्हों में जल जो निथराया
मन का ही दर्द उमड़ अँखियन में छाया

आँखों में भर आए उस जल को प्यारे
तुम वंशी से पोंछो
अब मत सोचो


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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