उतारी जाए!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय चंद्रसेन विराट जी की एक कवि ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ।

विराट जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय चंद्रसेन विराट जी की ये ग़ज़ल – 

अब हथेली न पसारी जाए.
धार पर्वत से उतारी जाए.

अपनी जेबो में भरे जो पानी
उसकी गर्दन पे कटारी जाए.

अब वो माहौल बनाओ, चलके
प्यास तक जल की सवारी जाए

झूठ इतिहास लिखा था जिनने
भूल उनसे ही सुधारी जाए..

कोई हस्ती हो गुनाहोंवाली
कटघरे बीच पुकारी जाए.

उनसे कह दो कि खिसक मंचों से
साथ बन्दर का मदारी जाए

तोड़ दो हाथ दुशासनवाले
द्रौपदी अब न उघारी जाए..


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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