घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय मुक्तिबोध जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

मुक्तिबोध जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए प्रस्तुत है मुक्तिबोध जी की ये कविता- 

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा
तेरी प्रत्यंचा का कम्पन सूनेपन का भार हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पन्द हृदय के अन्धकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण बाण की नोकों पर जीवन-सँचार करेगा।

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अन्तर में उतरेंगे
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपित तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन।


सभी उरों के अन्धकार में एक तड़ित वेदना उठेगी
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित, जड़ावरण की महि फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अँकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी।

हे रहस्यमय ! ध्वंस-महाप्रभु, ओ ! जीवन के तेज सनातन
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सर्जन
हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वन्दन
मेरे सर पर एक पैर रख, नाप तीन जग तू असीम बन ।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

                                     ********

4 responses to “घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा!”

  1. 🤝🤲🤔🙌🌟

    Liked by 1 person

  2. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 2 people

    1. नमस्कार जी

      Liked by 1 person

Leave a reply to R. Marshall Cancel reply