आज एक ग़ज़ल सादर अवलोकनार्थ
ग़ज़ल
अपना कौन, पराया कौन,
यह परिभाषा लाया कौन।
रिश्तों की तुरपाई में,
अपना स्वत्व गंवाया कौन।
सुविधाओं की नदिया में,
डूबा कौन, नहाया कौन।
इस जुलूस में लोगों के,
है अपना हमसाया कौन।
विषय नहीं कुछ तर्क नहीं
फिर ये बहस बढ़ाया कौन।
सत्ता के मदिरालय में,
पीकर खूब अघाया कौन।
अब तो कोई पदभार नहीं,
आज मेरे घर आया कौन।
भीड बहुत है लोगों की,
है अपना हमसाया कौन।
अहंकार के शिखरों पर,
सदा यहाँ टिक पाया कौन।
लूट ले गया है मेरे
गीतों का सरमाया कौन।
आज के लिए इतना ही, नमस्कार।
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