आज मैं हिंदी की श्रेष्ठ कवियित्री स्वर्गीय कीर्ति चौधरी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। यह कविता अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल थी।
कीर्ति जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कीर्ति चौधरी जी की यह कविता –

सुबह हुई तो,
सूरज फीका-फीका निकला ।
वातायन की हवा नहीं गाती थी गीत ।
सजे हुए गुलदानों के रक्तिम गुलाब,
क्या जाने क्यों पड़ते जाते थे,
प्रतिक्षण पीत ।
बाहर बिखरा,
क्षितिज शून्य मुझसे निस्पृह था ।
आकर्षण भी नहीं, न था कुछ आमन्त्रण ।
चित्र-लिखी-सी सज्जा दीवारों-पर्दों की,
आप लौट आती आवाज़,
कैसा प्रण ।
साँझ घिरी तो,
लगा अचानक अब अन्धियारी,
चिर अभेद्य होकर यहाँ ही मण्डराएगी ।
भूले-भटके एक किरण भी नहीं यहाँ
ज्योतिर्मय काँचन तन से भू
छू जाएगी ।
दीप जला, पर
उसका भी प्रकाश मटमैला
लौ की दीप्ति क्षीण होती जाती छिन-छिन ।
निर्बल होते मन पर सहसा याद घिरी —
’केवल एक तुम्हीं इस गृह में नहीं,
आज के दिन ।’
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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