बंधुआ मज़दूर!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

कैलाश वाजपेयी जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।       

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की यह कविता –


अरे तू काहे को रोता है
यहाँ कुछ ख़त्म नहीं होता
      छूट रही नहीं कोई संपदा
   यों ही बेमतलब क्यों
   कीचड़ बिलोता है.
भीतर से बाहर तक
ख़ाली ही ख़ालीपन जगमग था
आग,हवा,पानी को तरस आ गया
  शक्ल पा गया तू
कोशिश किये बिना
जोड़ किये ठीकरे
छत डाल ली
जहाँ देह तक किस्री और की मेहेर हो
डर मरने का बेमानी है
असल में दोष नहीं दो दीदों का
आदम की नस्ल
तीसरी आँख से कानी है.
         रोज़ जाल बुनता है
सर धुनता तू / देखकर / चौपट
यह धंधा हड्डी की खाल का
चोला तो लेकिन
    बचुआ हमेशा से
ब‍ंधुआ मज़दूर है
      काल का.

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

                                  ********

4 responses to “बंधुआ मज़दूर!”

  1. Nice teeth 😬 👌 😁

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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