आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह जी की यह कविता –

हरिजन टोली में शाम बिना कहे हो जाती है ।
पूरनमासी हो या अमावस
रात के व्यवहार में कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।
और जब दिन के साथ चलने के लिए
हाथ-पैर मुश्किल से अभी सीधे भी नहीं हुए रहते,
सुबह हो जाती है ।
कहीं रमिया झाड़ू-झँखा लेकर निकलती है
तो कहीं गोबिन्दी ग़ाली बकती है ।
उसे किसी से हँसी-मजाक अच्छा नहीं लगता
और वह महतो की बात पर मिरच की तरह परपरा उठती है ।
वैसे, कई और भी जवान चमारिनें हैं,
हलखोरिनें और दुसाधिनें हैं,
पर गोबिन्दी की बात कुछ और है —
वह महुवा बीनना ही नहीं,
महुवा का रस लेना भी जानती है ।
उसका आदमी जूता कम, ज़्यादातर आदमी की जबान
सीने लगा है । मुश्किल से इक्कीस साल का होगा,
मगर गोबिन्दी के साल भर के बच्चे का बाप है ।
क्या नाम है? — टेसू ! हाँ, टेसुआ का बाप
गोबिन्दी टेसुआ और उगना के बीच बँटी है
मगर टेसुआ के क़रीब होकर खड़ी है ।
उस बार टोले के साथ-साथ उसका घर भी जला दिया गया था,
और फगुना के बच निकलने पर
उसका एक साल का बालू आग में झोंक दिया गया था।
इस बार गोबिन्दी टेसू को लेकर अपने उगना पर फिरण्ट है,
पर उगना कुछ नहीं सुनता
दीन-दुनिया को ठोकर मार दिन अन्धैत देवी-देवता पर थूकता है,
बड़े-बड़ों की मूँछें उखाड़ता-फिरता है —
और लोगों को दिखा-दिखाकर आग में मूतता है ।
गोबिन्दी को पक्का है :
आग एक बार फिर धधकेगी,
और उसके टेसू को कुछ नहीं होगा —
सारी हरिजन टोली उसकी बाँह पकड़ खड़ी होगी,
और उस आग से लड़ेगी ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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