कुहरा उठा!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।

केदार नाथ सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। यह रचना अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल थी।                  

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का यह नवगीत –


कुहरा उठा
साये में लगता पथ दुहरा उठा,

       हवा को लगा गीतों के ताले
       सहमी पाँखों ने सुर तोड़ दिया,
       टूटती बलाका की पाँतों में
       मैंने भी अन्तिम क्षण जोड़ दिया,

उठे पेड, घर दरवाज़े, कुआँ
खुलती भूलों का रंग गहरा उठा ।

       शाखों पर जमे धूप के फाहे,
       गिरते पत्तों के पल ऊब गए,
       हाँक दी खुलेपन ने फिर मुझको
       डहरों के डाक कहीं डूब गए,

नम साँसों ने छू दी दुखती रग
साँझ का सिराया मन हहरा उठा ।

       पकते धानों से महकी मिट्टी
       फ़सलों के घर पहली थाप पड़ी,
       शरद के उदास काँपते जल पर

       हेमन्ती रातों की भाप पड़ी,

सुइयाँ समय की सब ठार हुईं
छिन, घड़ियों, घण्टों का पहर उठा !

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

सभी को पुनीत पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएं।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

                                     ********

3 responses to “कुहरा उठा!”

  1. नमस्कार 🙏🏻 होली की हार्दिक शुभकामनाएँ आपको 🌈❤️

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    1. नमस्कार जी, होली की हार्दिक शुभकामनाएं

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