आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।
ओम प्रभाकर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत –

ये फैले
खुले
दो हाथ
ये करें तो क्या करें?
छिली-कुचली-कसमसाती अँजुरियों में
धुआँ-कोहरा-रेत ये कैसे भरें!
रहें सहलाते
पीड़ा से चटकता माथ।
या कि बँधकर
मुट्ठियाँ ही तनें
तड़पें-मिटें जैसे गाज।
लेकिन आज
ये खुले दो हाथ केवल
ये फैले खुले दो हाथ केवल
कौन इनके साथ?
रहें सहलाते
पीड़ा से चटकता माथ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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