आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।
उमाकांत मालवीय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत –

गीत एक अनवरत नदी है
कुठिला भर नेकी है
सूप भर बदी है
एक तीर तोतले घरौंदे
खट्मिट्ठे गाल से करौंदे
नागिन की बीन
सुरसधी है ।
पत्थर के पिघलते मसौदे
पर्वत पर तुलसी के पौधे
सावन की सुदी है
बदी है ।
लहर -लहर किरण वलय कौंधे
मीनकेतु फिसलन के सौदे
अनलहक पुकार
सरमदी है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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