आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री अश्वघोष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।
अश्वघोष जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अश्वघोष जी का यह नवगीत –

पता नहीं किस ज़ालिम डर से
उठा नहीं सूरज बिस्तर से ।
मुख पर हाथ धरे कोलाहल,
ढूँढ़ रहा इस जड़ता का हल ।
पक्षी व्याकुल बुरी ख़बर से,
उठा नहीं सूरज बिस्तर से ।
चूल्हा लेता हैं अँगड़ाई,
अभी गोद में आँच न आई ।
चूक हुई क्या पूरे घर से,
उठा नहीं सूरज बिस्तर से ।
तरस रहे पोथी में आखर,
गूँजे नहीं चेतना के स्वर ।
बन्द पड़े हैं खुले मदरसे,
उठा नहीं सूरज बिस्तर से ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to R. Marshall Cancel reply