कट गई झगड़े में!

आज मैं देश के मशहूर शायर रहे ज़नाब अकबर इलाहाबादी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ।

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है ज़नाब अकबर इलाहाबादी जी की यह ग़ज़ल –


कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की
शाम को बोसा लिया था, सुबह तक तक़रार की

ज़िन्दगी मुमकिन नहीं अब आशिक़-ए-बीमार की
छिद गई हैं बरछियाँ दिल में निगाह-ए-यार की

हम जो कहते थे न जाना बज़्म में अग़यार की
देख लो नीची निगाहें हो गईं सरकार की

ज़हर देता है तो दे, ज़ालिम मगर तसकीन को,
इसमें कुछ तो चाशनी हो शरब-ए-दीदार की|

बाद मरने के मिली जन्नत ख़ुदा का शुक्र है,
मुझको दफ़नाया रफ़ीक़ों दोस्तों ने गली में यार की|

लूटते हैं देखने वाले निगाहों से मज़े,
आपका जोबन मिठाई बन गया बाज़ार की|


थूक दो ग़ुस्सा, फिर ऐसा वक़्त आए या न आए,
आओ मिल बैठो के दो-दो बात कर लें प्यार की|

हाल-ए-‘अकबर’ देख कर बोले बुरी है दोस्ती,
ऐसे रुसवाई, ऐसे रिन्द, ऐसे ख़ुदाई ख़्वार की|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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3 responses to “कट गई झगड़े में!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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