आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ गीत कवि श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ।
राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत –

श्याम रंग में रंगी चुनरिया
कौन दूसरा तंग खिलेगा?
बैठी हूँ मैं ठगी-ठगी-सी
सोई-सोई, जगी जगी सी
गूंज रही अब तलक कान में
तान मधुर वह प्रीत पगी सी।
टोना सा कर गई बांसुरी
मोह मंत्र अब कौन छलेगा??
पावन चरण छुए मोहन के
भाग्य जगे मेरे आंगन के
अब क्या जमुना तीर सुहाए
सपन छलें कैसे मधुवन के।
घर आये जब स्वयं संवरियां
कौन गांव अब पांव चलेगा?
कभी न प्रिय का हाथ गहूँगी
इंगित कर हर बात कहूंगी।
उनकी मायावी काया के
छाया बनकर साथ रहूँगी
लगे न जग की निठुर नजरिया
चुपके चुपके प्यार पलेगा।
सजी न मैं बारात न आई
बजी न मेरे घर शहनाई
फिरे न फेरे, चढ़ी न डोली
फिर भी मैं हो गई पराई
ब्याह जोग मेरी न उमरिया
कैसे उनसे जोड़ मिलेगा?
श्याम रंग में रंगी चुनरिया
कौन दूसरा रंग खिलेगा
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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