आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।
माहेश्वर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत –

चीख़ बनते जा रहे
हम सब खदानों की
हो गए हैं शोकधुन
बजते पियानो की ।
कल तलक सुनते रहे जो
आज बहरे हैं
आँसुओं के बोल जिनके
पास ठहरे हैं
ज़िन्दगी अपनी हुई है
मैल कानों की ।
देखते जब शब्द के
बारीक छिलके खोल
देश लगता रह गया
बनकर महज भूगोल
एक साजिश है खुली
ऊँचे मकानों की ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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