आज मैं हिंदी नवगीत विधा के अनूठे कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।
रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

क़लम में आग है तो ज़िन्दगी है ।
क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है ।।
कहाँ हैं शब्द के अँगार उनमें
क़लम जिनकी ख़रीदी जा चुकी है
लिखेंगे क्या ? गुनाहों की कहानी
जिन्हें मोटी रक़म हथिया चुकी है
तपस्या त्याग है तो ज़िन्दगी है ।
क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है ।।
क़लम बिकती नहीं है सिर्फ़ उसकी
जुड़ा है जो ज़मीं से, आदमी से
उसी ने चेतना को नोक दी है
दुखी है जो समय की त्रासदी से
रगों में राग है तो ज़िन्दगी है ।
क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है ।।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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