रँग गई पग-पग धन्य धरा!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।

निराला जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।                

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का यह नवगीत –

रँग गई पग-पग धन्य धरा,—
हुई जग जगमग मनोहरा ।

वर्ण गन्ध धर, मधु मरन्द भर,
तरु-उर की अरुणिमा तरुणतर
खुली रूप – कलियों में पर भर
          स्तर स्तर सुपरिसरा ।

गूँज उठा पिक-पावन पंचम
खग-कुल-कलरव मृदुल मनोरम,
सुख के भय काँपती प्रणय-क्लम
         वन श्री चारुतरा ।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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4 responses to “रँग गई पग-पग धन्य धरा!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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  2. This is stunning wow! Thanks for sharing.

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    1. Thanks and welcome.

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