रत्नदीप!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की यह कविता –

इस नीले सिंधु तीर, एक शाम
गीला एकान्त देख
आँख डबडबाई थी
और व्यथा की नन्ही जल चिड़िया
मुझसे कुछ बोली थी ।
मैंने इस सिंधु को—
आश्वासन का एक पाल दिया था, कहाँ है ?
अब भी यह सिंधु
सब दिशाओं के कानों में चिल्ला रहा है ।

किन्नर, गंधर्वों की गान भरी नगरी में
एक दिन,
टूटा एकतारा ले
भटक रहा मौन देख
गीत सुगबुगाया था
और अनरची रचना कुछ बोली थी ।
मैंने इस नगरी को, अपनी अनुभूति के
गहन नीले गह्वर से
बादल का एक गान दिया था; कहाँ है ?
अब भी इस नगरी के पाँवों में
पायल की जगह वही
सन्नाटा लिपटा है ।

अंधकार के क्षितिजों, टीलों, खंडहरों में
एक शाम,
एक दिग्भ्रमित यात्रा और
रुँधी दिशा देख,
चरण डगमगाए थे और दिशा
पंखकटी चिड़िया-सी मुझ से कुछ बोली थी ।
मैंने इस अंधकार के भिक्षुक हाथों को
रत्नदीप दिया था; कहाँ है ?
अब भी इस अंधकार में कितनी यात्राएँ
टूटी हुई मोती की माला-सी बिखरी हैं ।

मैंने जो रत्नदीप दिया था, कहाँ है ?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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2 responses to “रत्नदीप!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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