आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय हरीश निगम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।
निगम जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय हरीश निगम जी का यह नवगीत –

सुख अंजुरि-भर
दुख नदी-भर
जी रहे
दिन-रात सीकर!
ढही भीती
उड़ी छानी
मेह सूखे
आँख पानी
फड़फड़ाते
मोर-तीतर!
हैं हवा के
होंठ दरके
फटे रिश्ते
गाँव-घर के
एक मरुथल
उगा भीतर!
आक हो-
आए करौंदे
आस के
टूटे घरौंदे
घेरकर
बैठे शनीचर!
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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